माँ दुर्गा की अनंत कृपा
हर साल की तरह इस बार भी मैंने नवरात्रि के व्रत रखे। लेकिन इस बार कुछ विशेष था… इस बार मुझे प्रथम नवरात्रि पर माँ चिंतपूर्णी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
घर पर अकेला था, फिर भी मन में असीम शांति थी। माँ की कृपा से मैंने अपने हाथों से प्रसाद बनाया — कढ़ा प्रसाद, चने और पूरी — और माँ से प्रार्थना की —
“हे माँ, आज मेरे घर भी कन्या रूप में पधारो और मेरे द्वारा बनाए प्रसाद को स्वीकार करो।”
मन में थोड़ा भय भी था — क्योंकि यह पहली बार था जब मैं स्वयं प्रसाद बना रहा था। पता नहीं था कैसा बनेगा, पर माँ रानी की कृपा से सब अच्छे से हो गया।
जब कन्याओं के रूप में आईं माँ ने कहा, “बहुत अच्छा बना है,” तो वह सुनकर हृदय आनंद से भर उठा।
और जब पूजा के बाद मैंने स्वयं प्रसाद खाया, तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि यह मैंने बनाया था — ऐसा लगा मानो माँ ने स्वयं आकर इसे बनाया हो।
सुबह का समय था, लगभग 10:30 बजे। ज़्यादातर लोग तो सुबह-सुबह ही कन्या पूजन कर चुके थे।
मुझे थोड़ी देर हो गई थी, क्योंकि प्रसाद की पूरी तैयारी मैं अकेले कर रहा था। मन में यही सोच रहा था कि शायद अब कोई कन्या नहीं आएगी… सारे बच्चे तो स्कूल चले गए होंगे।
परंतु माँ रानी पर पूर्ण विश्वास था कि यदि भावना सच्ची है तो माँ ज़रूर कृपा करेंगी।
और सच में, माँ की असीम कृपा देखिए — जैसे ही मैं बाहर निकला, पाँच छोटी कन्याएँ जाती दिखाई दीं। मैंने उन्हें सादर अपने घर आने का निमंत्रण दिया। कुछ ही देर में मेरे भांजे हृदय को बुलाने हमारे घर के पास की चार कन्याएँ भी आ गईं।
इस तरह मेरे घर कुल नौ कन्याएँ आईं — और साथ में एक लंगरवीर (बालक) भी था।
उस क्षण मेरा हृदय भावनाओं से भर उठा। ऐसा लगा मानो स्वयं माँ दुर्गा अपने नौ रूपों में मेरे घर पधारकर मेरी भक्ति को स्वीकार करने आई हों।
कभी-कभी सोचता हूँ — माँ रानी कितनी दयालु हैं, हर कठिनाई में साथ देती हैं और अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनती हैं।
माँ रानी की कृपा सदा मेरे साथ रही है, और आज फिर उन्होंने यह एहसास दिलाया कि —
“जब मन सच्चे भाव से पुकारता है, माँ स्वयं अपने भक्त के द्वार पर आती हैं।”
मेरे पास शब्द नहीं हैं जो मेरे हृदय की भावना को व्यक्त कर सकें…
बस इतना कह सकता हूँ —
जय माता दी
Vijay Arora

